कृपा की न होती जो आदत तुम्हारी ।
तो सुनी ही रहती अदालत तुम्हारी ।।
जो दीनों के दिल में जगह तुम न पाते ।
तो किस दिल में होती हिफाजत तुम्हारी ।।
गरीबों की दुनियां है आबाद तुमसे ।
गरीबों से है बादशाहत तुम्हारी ।।
न हम होते मुजरिम न तुम होते हाकिम ।
न घर घर में होती इबादत तुम्हारी ।।
तुम्हारे ही उलफत में दृग बिंदु है ये
तुम्हे सोंपते हैं अमानत तुम्हारी ।।

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