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उठ जाग रे मुसाफिर ,किस नीद सो रहा है !


उठ जाग रे मुसाफिर ,किस नीद सो रहा है !

जीवन अमूल्य प्यारे , क्यों मुफ्त खो रहा है !! 

रहना न यहाँ पर होगा , दुनियां सराय फानी !

फंस कर वदी में प्यारे , क्यों मस्त हो रहा है !!

ले ले धरम की तोफा , मत भूल ऐ दिवाने !

नेकी की खेती करले , क्यों पाप बो रहा है !!

माता-पिता व भाई , होंगे न कोई साथी !

क्यों मोह रूपी बोझा , नाहक ढो रहा है !!

किश्ती तेरी पुरानी , हिकमत से पारकर ले !

ऐ दिल अथाह जल में , तू क्यों डुबो रहा है !!

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