साधु अर्थात सज्जन , सहनशील , जिनका ह्रदय
करुणा से भरा हो , जो किसी जीव के दुःख को देख ना सके , जो सब प्राणियों को एक
समान समझता हो ,जिसका कोई शत्रु न हो , वह
साधु होते हैं !
साधु को स्वामी इसलिए कहते हैं , क्योकि लक्ष्मी या जगत की
किसी वस्तु का वह दास नहीं होता है ! वह मन का स्वामी होता है , इन्द्रियों का
स्वामी होता है ,भोगों का स्वामी होता है ! उत्तम भोक्ता अर्थात बिना वासना ,
इच्छा के भोग को प्राप्त करता है , जरुरत हो तो उपयोग करता है ,नहीं तो छोड़ देता
है वह उत्तम भोक्ता होता है !
दास कौन है ? जो भोगों के पीछे भटकता रहे , लटकता रहे ,
मिले तो पेट भरे नहीं , और न मिले तो शांति हो नहीं !
उत्तम
व्यक्ति वही है जो भोग वस्तु मिलने पर उसका औषधनुमा उपयोग करता है और नहीं मिले तो
भी मस्त रहता है !!
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