एक बगीचे के माली को दुसरे गांव में भेजा गया !बगीचे के
पौधों पर लगे यंत्रो ने पौधों के भीतर बढ़ाते हुए विषद पूर्ण कम्पनो को दर्शया
,जैसे माली के दूर जाने से पौधों को बड़ा दुख हुआ ,फिर जिस दिन माली ने बगीचे के
पास आना आरम्भ किया ,उसी समय से यंत्रो ने पौधों के भीतर फैलते हुए हर्षोलॉस के
आंदोलनों को दर्शाना शुरू कर दिया ! चैतन्य की सुषुप्त अवस्था में रहती हुई
बनास्पतियो पर अशिक्षित माली की चेष्टाओ का प्रभाव पड़ता है ,तो परम सूक्ष्म अवस्था
में विचरण करते हुए सद्गुरु की अमृतवाणी दृष्टि से शिष्य के अन्दर सोई हुई चैतन्य
की चिंगारी सुलग कर विशाल प्रकाशपुंज बन जाये तो इसमे आश्चर्य क्या है ?
एक्सरे मशीन
तुम्हारे पहने हुए कपड़े ,तुम्हारी चमड़ी ,स्नायु ,रक्त ,मांस उन सबके आर-पार जाकर
हड्डियों के फोटो खीच लेती है ,तो तुम्हारे भीतर जो अन्नत चैतन्य तत्व है
,तुम्हारा जो वास्तविक स्वरुप है वह तुम्हे ज्ञात नहीं ! परन्तु सद्गुरु को स्पष्ट
रूप से ज्ञात है !!
विश्व में यदि कोई महान से भी महान कार्य है तो, वह है जीव
को जगाकर उसे उसके शिवत्व में स्थापित करने का ! प्राकृत की पराधीनता से छुड़ाकर
उसको मुक्त बनाने का !!
गुरु के सानिध्य मात्र से जीव की जड़ता
बिखरने लगाती है ,और सच्चिदानंद स्वरुप प्रकट होने लगता है !
बारह कोस चलकर
जाने से भी यदि ऐसे सत्पुरुष के दर्शन मिलते हो तो मै पैदल चल जाने के लिए तैयार
हूँ ! क्योकि ऐसे महापुरुष के दर्शन से कैसा अध्यात्मिक खजाना मिलाता है ,वह मै
अच्छी प्रकार से जनता हूँ !! “स्वामी विवेकानंद’’
किशान चाहे कितनी भी खेती करे ,खाद डाले ,बिज बोये ,पानी
देवे, परन्तु जब तक सूर्य का प्रकाश नहीं मिलता तब तक सब ब्यर्थ है !
ऐसे ही मनुष्य चाहे कितना भी जप तप करे ,यम नियमो का पालन
करे ,परन्तु जब तक सद्गुरु रूपु सूर्य का आत्म प्रकाश नहीं मिलता तब तक सब ब्यर्थ
है !! “स्वामी
रामतीर्थ’’
वे गुरु गुरु नहीं है जो शिष्य
को हमेश के शिष्य ही बनाये रखना चाहता है ! सदगुरु वे ही है जो शिष्य को जीवत्व से
हटाकर शिवत्व में जगा दे ,शिष्यत्व से हटाकर गुरुत्व में जगा दे ,आत्मज्ञान का
अमृत सिंचन करके निर्विषय सुख में सैर कर दे ,ध्यान और ज्ञान की अमृत धारा में
नहलाकर परमपद का अमृत प्रसाद दे !!
हम न हंसकर सीखें हैं ,न रोकर सीखें हैं !
जो कुछ भी सीखें हैं ,सद्गुरु के होके सीखें हैं !!

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