प्रभु नाम का सुमिरन वह पहरेदार है जो काल तक को जीवन की दहलीज से लौटा देता
है .इसके प्रहार से काल तक पछाड़ा जा सकता है, जैसे घनघोर रात्रि सूर्य के आते ही
ठहर नहीं सकती इसी प्रकार मौत के सौदागर काल भी वहां चौकड़ी नहीं लगा सकता ,जहाँ
सुमिरन होता है !
कबहुं काल न
ब्यापहि तोहि !
सुमिरेसु भजेसु निरंतर मोहि !!
वह काल के भय से अभय रहता है !नाम सुमिरन काल के विरुद्ध एक मात्र अभेद कवच है
इसे करने हेतु कबीर के जीवन का एक वाकया सुनाता हूँ ...
एक बार काशी नरेश के कानो में कबीर
के धर्म और बंदगी सम्बन्धी तर्क संगत व्याख्या की भनक पड़ी !उसने धमकी दी बंद कर
अपना बकवास ,नहीं तो मृत्यु के घाट उतार दिया जायेगा !पर कबीर ने कैसी –कैसी अमर
वाणीयां रच दी ...
माली आवत देख के,
कलियन करी पुकार !
फूली फूली चुन लिया ,काल हमारी बार !!
आये हैं सो जायेगें
राजा रंक फकीर !
कबीर ने डंके के चोट पर कहा राजन मृत्यु एक अटल सत्य है ,
फूल खिल कर मुरझाता ही है ,राजा हो या रंक जो जन्म लिया है संसार में उसे एक
दिन जाना ही है !फिर घटना से डरना क्या ? राजा ने कहा कबीर अनर्गल बातो का प्रचार
करके तू भी वही मुर्खता कर रहा है !क्या मेरे हाथो बेमौत मरने का हठ ठाने बैठा है! कबीर ने एक और तर्क का तीर छोड़ा ...
खुला खेल संसार का,
बाँधी सके न कोय !
जाको राखै सांइयां , मारी सके न कोय !!
राजा तू मुझे मारेगा ! अरे ,जिस पर
साईं की छतरी है उसका गरजते बादल क्या बिगाड़ सकते है ? राजा के आँखों में मानो
मिर्ची डल गई , क्रोध के मारे लाल भट्ठी की तरह तपने लगी ,दांत पिसते हुए उसने
फरमान जरी कर दिया ..
जाओ उठा कर फेक डालो इस दुष्ट ,मस्त हाथी के पावों तले मौत दिखेगी तो अपने आप
अक्ल ठिकाने आ जाएगी ,
पर कबीर तो कबीर थे कहाँ डराने वाले फाकामस्त होकर ठहाका लगा उठे ! राजा का
क्रोध सातवें आसमान को छू गया ,खीजता हुआ बोला “हद हो गई हद “ अरे पागल आदमी, क्या
तुझे जरा भी काल का भय नहीं ,अब भीं हंस
रहा है ! मै कहता हूँ अब भी समय है ,आ झुक जा मेरे कदमो में माफ़ी मांग कर
सलाम कर ले ! नि:संदेह मै तुझे जीवन दान
दे दूंगा ,पर कबीर कम नोकीला अस्त्र छोड़ा ,पता है क्या बोला ?.
.
काल पकड़ चेला किया
,भय का कतरा कान !
मैं सतनाम सुमिरन
करूँ ,किसको करू सलाम !!
अरे ओ बुद्धू राजा !मैं सलाम करू तुझे किसे डरा रहा है ,मै तो भय का कान क़तर
चुका हूँ ,समझो काल को पकड़ चेला बना चुका
हूँ !
कबीरा हमरे नामबल
सात दीप नौ खंड !
जम डरवे सब भय करे गाज
रहा ब्रह्माण्ड !!
आदि नाम की ताकत के सामने जम के पसीने
छुट जाते हैं, सात दीप नौ खंडो में जिसका कोई जोर नहीं ,ब्रहमांड में जिसका डंका
बज रहा है यह नाम कालजयी है मृतुन्जयी है !
खिचड़ी पतीले में उबलते दाल चावलों को
देखा होगा ,अशांत हो कूद फांद करते नजर आते है ,क्योकि दाल-चावल के दाने अभी कच्चे
है ,आंच लगाने दो जब पक जायेगा तब उछलना कूदना
बंद हो जायेगा, पतीले के अन्दर की दुनिया शांत हो जाती है !
इसी तरह नाम सुमिरन की आंच है मन को
निरंतर सेकने की आवश्यकता है !धीरे-धीरे यह मन पकता जायेगा विषयों की ओर कूद फांद
शांत हो जाएगी !मेहदी के हरे पत्ते देखे होगें ब्लेड से कटाने पर भी लाली नहीं दिखती
!लेकिन जब सिल्ली पर रगड़ा जाता है तब लाली
छलक आती है !दही से मखन के लिए मथना होगा !
यही उक्ति अपनानी है रगड़ो
सुमिरन की शिला पर इस मन को !!

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