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सही चुनाव का फल




     बात उस समय की है ,महर्षि चाणक्य ने भारत को सिकंदर के शासन से आजाद करा दिया था !चन्द्रगुप्त मौर्य  राजपद पर आसीन हो चुके थे !चन्द्रगुप्त के रहने के लिये बहुत बड़े महल का निर्माण कराया गया ,जिसमे अथाह सम्पति व समय लगा !जब महल बन कर तैयार हो गया ,तब महल में प्रवेश करने से पहले अपने गुरु चाणक्य से अनुग्रह किया कि आप सर्वप्रथम अपने चरणों से महल को पवित्र करे !शिष्य के अनुग्रह पर चाणक्य महल में प्रवेश किया ,पुरे महल को अच्छी तरह देखा ,हर ओर उसका निरिक्षण किया !महल की बनावट से प्रभावित थे!  चाणक्य ने गंभीर स्वर में कहा चन्द्रगुप्त इस महल को अभी तुरंत जला कर राख कर दो !यह कह कर गुरुदेव चले गए अपनी कुटिया की ओर ! चन्द्रगुप्त स्तब्ध खड़ा रह गया !  हैरानी से आँखे फटी और मुख खुला रह गया ,इतना आलिशान महल और जला दो ! एक ओर मन में ख़ुशी ,दूसरी ओर गुरु की अटपटी लगाने वाली कठोर सी आज्ञा! मन-बुद्धि-आत्मा के बिच संघर्ष उठ खड़ा हुआ !चुनाव मुश्किल था ,पर अंततः उसने निर्णय कर लिया !दो विकल्पों में से एक का चयन किया किसका ? मन का नहीं ! गुरु का ! उसने महल को जलने का निर्देश दे दिया कुछ ही मिनटों में सारा महल धू-धू करके जलने लगा ,आग की लपटों में जलकर वह आलिशान महल राख की ढेरी बनता गया !

   चन्द्रगुप्त मायूस खड़ा देखता रह गया ,तभी चौका देने वाला एक दृश्य सामने आया महल की राख के साथ कुछ और भी था पर क्या ? कई जली हुई इंसानों की लाशें !अब उसके मन में प्रश्न उठने लगा, कौन थे ये लोग ? महल तो पूरा खाली था ! फिर ये सब कहाँ से आ गए ! तभी पीछे गुरु चाणक्य की आवाज आई ,चन्द्रगुप्त , ये दुश्मन सेना के गुप्तचर थे ! जो तुम्हे मारने आये थे ! इस महल के जरिये दुश्मनो ने तुम्हे मारने का षड़यंत्र रचा था !महल के नीचे एक ख़ुफ़िया सुरंग बनाई गई थी ,उसमे ये दुश्मन छिप कर बैठे थे तुम वार करने के लिए !
चन्द्रगुप्त ने कहा- गुरुदेव यह पता आपको कैसे लगा ,तो गुरुदेव ने कहा –निरिक्षण के समय कुछ जगहों पर चिट्टियो का झुण्ड देखा ,तभी मैंने  समझा इस महल में गुप्त सुरंग का निर्माण किया गया है ,दुश्मन इसी ताक में था ,कि ,तुम रहने के लिए आते और वह वहीं समाप्त कर डालता !
  चन्द्रगुप्त ,गुरु के चरणों में गिर गया... !मन के वशीभूत होकर किया गया, चन्द्रगुप्त का एक चुनाव उसे राख की ढेर में बदल सकता था ,पर गुरुदेव के विवेक पूर्ण निर्णय का चयन उसे अपने ऊपर मंडराते घातक खतरे को मिट्टी में जला कर खाक कर दिया !
“जिंदगी जीवन में लिए गए चुनावों के साँचो में ढलती है !!’’ 

     श्री कृष्ण के बहुत बार समझाने पर भी दुर्योधन नहीं माना ,महाभारत का युद्ध निश्चित हो गया !कृष्ण ने अर्जुन और दुर्योधन के सामने एक चुनाव रखा ! एक ओर मै अकेला निःशास्त्र खड़ा हूँ ,और दूसरी ओर अस्त्र-शस्त्र से सुसजित मेरी चतुरंगिनी सेना रहेगी ! करलो चुनाव ! अर्जुन ने कृष्ण को चुना , दुर्योधन ने सेना पर मुहर लगाई ! परिणाम सभी जानते हैं!

इसलिए चुनव करते समय आकार का शिकार न बने !!

अर्जुन की टक्कर से कर्ण था ,अर्जुन के बध के लिए एक अमोघ शक्ति थी ,फिर भी कर्ण अर्जुन का बध नहीं कर पाया ! जिस शक्ति से अर्जुन को मरना था वह दुर्योधन के दबाव में आकर उस शक्ति से घटोचक का बध कर दिया , जिससे बड़ा लक्ष्य हासिल करना था ! वह सही चुनाव न होने के कारन ब्यर्थ चली गई !!

     त्रेता में विभीषण के चुनाव ने उन्हें मान-सम्मान प्रतिष्ट एवं एश्वर्य प्रदान किया ! वही कैकई के गलत चुनाव के कारण तिरस्कार व घृणा का पात्र बना दिया !विभीषण चाहते तो राम के स्थान पर रावण का चुनाव करते ,पर विवेक से काम लिया !
दूसरी ओर मंथरा की कूटनीति से कैकई क्या कहती है ?

“ तोहि सम हित न मोहि संसारा ’’

परिणाम कैकई को युगों-युगों तक कलंकित कर गया !!

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