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वीर्य का बनना





      हम जो आहार लेते है ,उससे क्रमशः रस ,रक्त ,मांस ,मज्जा ,आस्तियां आदि बनते हैं ! आयुर्वेद के कथनानुसार ,दो दिन के भोजन [१६०० ग्राम ] से करीब ४० ग्राम रक्त और ४० ग्राम रक्त से एक ग्राम वीर्य बनता है !इस प्रकार एक मास के भोजन से डेढ तोला अच्छा वीर्य बनता है !एक बार वीर्य गवाने से लगभग एक करोड़ अस्सी लाख से दो करोड़ चौबीस लाख शुक्राणु नष्ट होते हैं ,जो मनुष्य को शक्ति देने और बीमारियों का सामना करने के लिए उपयोगी हैं ! इसलिए इस शक्ति प्रदान करने वाले शुक्राणुओ को अनुचित ढंग से नष्ट करने से मनुष्य की शक्ति क्षीण हो जाती है !और वह बीमारियों से घिरा रहता है !!

   अन्दर जाता है तो कितना मजा आता है !
   अन्दर रह जाए तो कितना मजा आएगा !

इस नियम को बड़े-बड़े संत महात्मा जो जटाधारी हैं ,कंठीधारी हैं ,वही पालन कर पाते हैं !आम मनुष्य के वश की बात नहीं है !


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