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रसखान की काव्य

मानुष हों तो वही रसखान, बसौं नित गोकुल गाँव के ग्वारन।

जो पसु हौं तौ कहा बसु मेरौ, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन।।

पाहन हौं तौ वही गिरि कौ जुधर्यौ कर छत्र पुरंदर कारन।

जो खग हौं तो बसेरौं नित, कालिंदी-कूल कदंब की डारन।।

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